सपा-बसपा-रालोद गठबंधन तय, जानिए किसे मिलेगी मुजफ्फरनगर और कैराना सीट

लखनऊ/मुजफ्फरनगर। क्या उत्तर प्रदेश में बहुचर्चित विपक्षी एकता पटरी से उतर रही है? मंगलवार को विधानसभा सत्र के पहले दिन बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और समाजवादी पार्टी (एसपी) ने सेंट्रल हॉल में पारंपरिक मीडिया ब्रीफिंग से कन्नी काट ली। हालांकि शीतकालीन सत्र के पहले दिन कांग्रेस ने जरूर उन मुद्दों के बारे में मीडिया को बताया जिन्हें वह उठाना चाहती है। इससे पहले तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार के शपथग्रहण से अखिलेश यादव और मायावती ने दूरी बनाई थी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यूपी में महागठबंधन अभी दूर की कौड़ी है।

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राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकारों के शपथग्रहण समारोह में दोनों पार्टियां शामिल नहीं हुई थीं। हालांकि गौर करने वाली बात यह है कि एसपी-बीएसपी ने इन राज्यों में कांग्रेस सरकार को अपना समर्थन दे रखा है। मध्य प्रदेश में तो कांग्रेस अल्पमत में थी लेकिन एसपी ने अपने एक और बीएसपी ने दो विधायकों के समर्थन का ऐलान करके सरकार गठन का रास्ता साफ किया था। इस बीच शपथग्रहण में शामिल ना होने को लेकर दोनों पार्टियों ने चुप्पी साध रखी है। माना जा रहा है कि एसपी और बीएसपी के बीच यूपी की 80 लोकसभा सीटों के बंटवारे का फॉर्म्युला तकरीबन तय हो चुका है। इसमें कांग्रेस के लिए गुंजाइश काफी कम है। वहीं चौधरी अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) को वेस्ट यूपी में तीन सीटें मिल सकती हैं। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस को अमेठी और रायबरेली सीट पर वॉकओवर दिए जाने की संभावना है। लेकिन इसके अलावा एसपी और बीएसपी कांग्रेस को गठबंधन के तहत और सीटें दिए जाने को तैयार नहीं नजर आ रही हैं।
इस घटनाक्रम ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी-एसपी के गठबंधन में कांग्रेस के शामिल होने पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि यहां तक कि इस साल हर सत्र की शुरुआत से पहले विपक्षी दलों की होने वाली औपचारिक बैठक और चर्चा तक नहीं हुई। इस बीच एक वरिष्ठ बीजेपी नेता का कहना है कि सत्र के पहले दिन पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और मंत्री राजकुमार वर्मा को श्रद्धांजलि दी गई लिहाजा कहने को कुछ नहीं है। उन्होंने कहा, ’मंगलवार को कुछ भी नहीं हुआ लिहाजा हमने मीडिया से बात नहीं की। कांग्रेस को भी ऐसे दिन कोई राजनीतिक टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।’
एसपी के एक विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) का कहना है कि चूंकि विधान भवन के बाहर सुबह एक विरोध प्रदर्शन था और इस दौरान मीडिया को संबोधित किया गया, ऐसे में दोबारा मीडिया से बात करने की जरूरत नहीं थी। हालांकि एसपी-बीएसपी की ओर से औपचारिक ब्रीफिंग से दूर रहने पर प्रतिक्रिया देने से इनकार करते हुए कांग्रेस सूत्रों ने कहा कि यह सत्र अनूठा है क्योंकि विपक्षी पार्टियों ने एक साझा रणनीति के लिए अब तक कोई बैठक नहीं की है। एक वरिष्ठ कांग्रेस सदस्य ने कहा, ’आम तौर पर हर सत्र के पहले विधानसभा और विधान परिषद में विपक्षी पार्टियां एक-दूसरे से मिलती हैं और अनौपचारिक रूप से आगे की रणनीति पर चर्चा करती हैं। प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में एसपी ज्यादातर पहल करती रही है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ है।’


मायावती, अखिलेश यादव और जयंत चौधरी की शपथ ग्रहण समारोह से दूरी के बाद कांग्रेस की गठबंधन में मौजूदगी को लेकर वेस्ट यूपी में काफी चर्चा है। दरअसल, जिस तरह से एसपी, बीएसपी और आरएलडी की तरफ से कांग्रेस से अलग रहने का संदेश देने की कोशिश की जा रही है, उससे माना जा रहा है कि 2019 में वेस्ट यूपी में सियासी तस्वीर अलग हो सकती है। वेस्ट यूपी में दलित, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग (जाट) के वोटों के सम्मिलित आंकड़े बीजेपी को 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में मिले मतों से काफी भारी है। दलितों पर बीएसपी, पिछड़ों (जाटों) पर आरएलडी और बीजेपी, मुस्लिमों पर एसपी-बीएसपी, आरएलडी और कांग्रेस का दावा है। कांग्रेस के अलग रहकर चुनाव लड़ने से सहारनपुर, मुरादाबाद, गाजियाबाद, मेरठ आदि जिलों में गठबंधन को मिलने वाले वोटों में खासकर मुस्लिमों में बंटवारे का सबसे बड़ा खतरा संभावित है। ऐसे में बीजेपी को फायदा हो सकता है।
जानकारों की मानें तो वेस्ट यूपी की करीब 35 प्रतिशत सीटों पर मुस्लिम मत निर्णायक है। जनसंख्या में मुस्लिमों की आबादी करीब 19 फीसद है। शहरी इलाकों में करीब 32 और ग्रामीण इलाकों में 16 फीसद है। यूपी में 13 लोकसभा सीटों पर मुस्लिमों की आबादी 30 फीसद या उससे ज्यादा है। मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर में 40 फीसद से ज्यादा मुसलमान हैं। रामपुर में 50 फीसद से ऊपर मुस्लिमों की तादाद है। कैराना में 35 फीसद से ज्यादा, मेरठ में 30 से ज्यादा, बागपत, गाजियाबाद में 25 फीसद से ज्यादा मुस्लिम हैं। नगीना और बरेली ऐसे जिले हैं, जहां एक तिहाई मुस्लिम हैं। सिर्फ गौतमबुद्धनगर और बुलंदशहर में 20 फीसदी से कम मुस्लिम हैं। बीजेपी के वेस्ट यूपी अध्यक्ष अश्विनी त्यागी का कहना है कि संभावित गठबंधन स्वार्थ की कवायद है, इसे ना तीन राज्यों के चुनाव में होना था और ना आगे 2019 के चुनाव में होगा।
आरएलडी नेता जयंत चौधरी राजस्थान में कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़े। भरतपुर से उनका एक विधायक जीता। वैसे यूपी में उनकी नजदीकी कांग्रेस से ज्यादा एसपी-बीएसपी से हैं। कैराना लोकसभा उपचुनाव आरएलडी ने एसपी से कैंडिडेट उधार लेकर लड़ाया था और बीएसपी ने समर्थन दिया था। 2019 के संभावित गठंबधन में भी दोनों दलों के साथ आरएलडी भी तय है। जयंत मुजफ्फरनगर दंगे के बाद कमजोर हुई पार्टी की यूपी में मजबूती चाहते हैं। सूत्र बताते हैं कि इसलिए कांग्रेस के सहयोगी होने के बाद भी राजस्थान सीएम की शपथ में जयंत चौधरी नहीं गए। उन्होंने सोमवार की सुबह ही फ्लाइट कैंसल कराई। आरएलडी के राष्ट्रीय महासचिव त्रिलोक त्यागी का कहा है कि चौधरी अजित सिंह अमरोहा में दौरे पर थे और जयंत चौधरी को सुबह अचानक तबीयत खराब होने से प्रोग्राम रद्द करना पड़ा।
आज सुबह बसपा-सपा और रालोद के बीच हुए गठबंधन फायनल होने की खबरों के बीच यह चर्चाएं भी सामने आई हैं कि गठबंधन में रालोद को कैराना, बागपत और मथुरा लोकसभा सीट दी जा रही है। ऐसे में सवाल खडा हो गया है कि मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट किस पार्टी के खाते में जाएंगी। रालोद के वरिष्ठ पदाधिकारियों के अनुसार अभी गठबंधन शुरुआती चरण में हैं और रालोद हर कीमत पर मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट अपने पास रखेगा। आने वाले दिनों में इस बारे में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी। उल्लेखनीय है कि मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर रालोद प्रमुख चौधरी अजित सिंह के चुनाव लडने की चर्चाएं हैं। हालांकि चौधरी अजित सिंह अभी तक इस बारे में खुलकर नहीं बोले, मगर मुजफ्फरनगर लोकसभा क्षेत्र में उनकी बढती हुई गतिविधि इसी ओर इशारा कर रही है। आज भी अजित सिंह ने मीरापुर में मुजफ्फरनगर जनसंवाद कार्यक्रम किया।

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