ये है सबसे कामयाब गर्भनिरोधक, फिर भी इस्तेमाल नहीं करती महिलाएं

गर्भनिरोध के लिए भारत में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय तरीक़ा नसबंदी रहा है. बल्कि ये विकल्प पूरी दुनिया में सब से ज़्यादा इस्तेमाल होता है. इसके बाद नंबर आता है गर्भ निरोधक दवाओं का. हालांकि, गर्भ निरोध के कई विकल्प हैं, लेकिन ये चलन में बहुत कम हैं। ऐसा ही एक विकल्प है आईयूडी यानी इंट्रा यूटेराइन डिवाइस. आकार में छोटे पेपर क्लिप के बराबर दिखने वाली आईयूडी कई आकार में आती है।
गोल और झालरदार से लेकर चार पैर वाली मकड़ी की शक्ल तक में ये गर्भ निरोधक उपलब्ध है।


भारत में सबसे ज़्यादा चलन में है, अंग्रेज़ी के अक्षर ज् के आकार वाली डिवाइस, यानी कॉपर-टी. ये प्लास्टिक की होती है और इसमें धागा निकला रहता है। पश्चिमी देशों में इसकी मांग ज़्यादा है. इसे महिला की कोख में फिट किया जाता है. कंपनी और क्वालिटी के आधार पर ये डिवाइस गर्भाशय में क़रीब 12 साल तक रह सकती है। इसे सबसे कामयाब गर्भनिरोधक माना जाता है. लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं कि सारी दुनिया की औरतें इसके बारे में जानती हैं। मिसाल के लिए एशिया में 27 फ़ीसद औरतें ही आईयूडी गर्भ निरोधक डिवाइस का इस्तेमाल करती हैं. जबकि उत्तरी अमरीका में महज़ 6.1 फ़ीसदी, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में महज़ दो प्रतिशत महिलाएं ही इसके बारे में जानती हैं। अमरीका में इसकी मार्केटिंग पर बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया. दवा कंपनियों ने गर्भनिरोधक गोलियों का प्रचार ख़ूब किया और मोटा पैसा कमाया. इसीलिए महिलाएं उनके बारे में ज़्यादा जानती हैं. उनका इस्तेमाल भी करती हैं।


नॉन-प्रॉफ़िट ह्यूमन डेवेलपमेंट संस्था एफ़एचआई 360 में काम करने वाले महामारियों के जानकार डेविड ह्यूबचर का कहना है कि बहुत सी कंपनियां कई तरह की गोलियां बाज़ार में उतार चुकी हैं. सभी गोलियों का फॉर्मूला कमोबेश एक जैसा ही है. पर हर कंपनी अपनी दवा को बेहतरीन गर्भनिरोधक बताकर बाज़ार में बेचती है. आईयूडी 1988 से बाज़ार में उपलब्ध है, लेकिन इसके प्रचार और मार्केटिंग पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया।
आईयूडी के बारे में जानकारी की कमी की और भी कई वजहें हैं. इसके बारे में कई तरह की अफ़वाहें लोगों के बीच फैलाई गई हैं. जैसे आईयूडी से सेक्शुअल लाइफ़ ख़राब हो जाती है. इससे बहुत दर्द होता है. सबसे ज़्यादा ग़लतफ़हमी तो ये है कि आईयूडी से बांझपन हो जाता है। लोगों के बीच इस ग़लतफ़हमी का पहला सबूत उन्नीसवीं सदी में मिला था. दरअसल आईयूडी बनाने से पहले रिसर्चर और भी कई तरह की तरकीबों पर काम कर रहे थे. तजुर्बे के तहत ही महिलाओं की कोख में कई तरह की डिवाइस लगाई गई थीं. इन्हें स्टेम पेसरीज़ कहा जाता था. ये रबर, कांच या धातु से बने होते थे. लेकिन आईयूडी का सबसे कामयाब वर्जन 1920 में जर्मनी के डॉक्टर अर्न्स्ट ग्रेफ़ेनबर्ग ने बनाया था. जी-स्पॉट का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा है।
ग्रेफ़ेनबर्ग का डिज़ाइन किया हुआ आईयूडी एक सादे छल्ले जैसा था जिसे गर्भाशय में लगा दिया जाता था. डॉक्टर ग्रेफ़ेनबर्ग अपने प्रोजेक्ट पर अभी काम कर ही रहे थे कि जर्मनी के नाज़ियों ने इन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया। लेकिन बाद में इन्हें डॉक्टर मार्गरेट सेंगर ने किसी तरह आज़ाद कराया और उन्हें लेकर अमरीका आ गईं. यहां आकर उन्होंने फिर से अपने प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया. चीन की वन-चाइल्ड पॉलिसी कामयाब बनाने में आईयूडी का अहम रोल है।

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1960 में अमरीका में डलकोन शील्ड नाम की आईयूडी बाज़ार में उतारी गई. ये डॉक्टर ग्रेफ़ेनबर्ग की बनाई आईयूडी की तरह ही थी. लेकिन ये साइज़ में बड़ी थी और इसमें घोड़े की नाल की तरह तार निकला होता था। हालांकि मक़सद बेहतर आईयूडी बनाने का था, लेकिन इसके नुक़सान ज़्यादा हुए. इससे इनफ़ेक्शन भी बहुत जल्दी होता था. ये डिवाइस इतनी बुरी तरह नाकाम हुई कि अमरीका में 50 हज़ार महिलाओं ने इसे बनाने वाली कंपनी के ख़लिफ़ केस कर दिया। डेविड ह्यूबचर का कहना है कि आईयूडी के मॉडर्न वर्जन काफ़ी बेहतर और असरदार हैं. लेकिन लोगों को इसके फ़ायदे से वाक़िफ़ कराना ज़रूरी है. मुंबई से लेकर मेलबर्न तक करोड़ों महिलाएं सुबह बिस्तर से उठते ही गोली खाती हैं. ये आसान काम नहीं है. जबकि आईयूडी लगने के बाद इतनी गोलियां खाने की ज़रूरत नहीं रहती और महिलाएं दिमाग़ी तौर पर आज़ाद रहती हैं।


आईयूडी दो वजहों से कारगर है. पहला तो यही कि आईयूडी लगने से कोख में ख़ून के व्हाइट सेल तेज़ी से उस जगह पहुंचते हैं जहां स्पर्म जमा होते हैं. ये व्हाइट सेल तेज़ी से स्पर्म को ख़त्म कर देते हैं. एक स्टडी के मुताबिक़ आईयूडी ऐसे सेल की संख्या एक हज़ार गुना बढ़ा देता है। आईयूडी का दूसरा फ़ायदा उसकी क्वालिटी और क़िस्म पर निर्भर करता है. आईयूडी का हॉर्मोनल वर्जन महिला की कोख में पैदा होने वाले अंडे के पास स्पर्म को जाने ही नहीं देता. इसके अलावा कॉपर आईयूडी पूरी तरह से स्पर्म किलर है. हालांकि कॉपर के इयॉन्स स्पर्म को कैसे नकारा बनाते हैं ये आज भी रहस्य है। आईयूडी के फ़ायदे अपनी जगह, इसके कुछ नुक़सान भी हैं. लेकिन फ़ायदों के मुक़ाबले नुक़सान ना के बराबर हैं. पहला तो यही कि आईयूडी डिवाइस को जब लगाया जाता है तो ये गर्भाशय की झिल्ली के सहारे ऊपर किया जाता है. इसमें किसी भी तरह की मेडिकल दिक़्क़त आ सकती है. लेकिन ऐसा बहुत ही कम होता है. शायद एक हज़ार में कोई एक केस ही ऐसा होता होगा।
श्रोतः बीबीसी

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