10 फीसदी सवर्ण आरक्षण, उल्टा पड़ सकता है मोदी सरकार का ये दांव…

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में चुनावी हार से झटका खाई भाजपा क्या अब 10 फीसदी सामान्य वर्ग आरक्षण से एक नई मुसीबत में उलझने वाली है? क्या सामान्य वर्ग को खुश करने में लगी मोदी सरकार का ये दांव अन्य वर्गों की नाराजगी के चलते उल्टा पड़ रहा है? इन तीनों राज्यों के एससी, एसटी व ओबीसी नेता खुलकर कह रहे हैं कि मोदी सरकार को यह फैसला लोकसभा चुनाव में भारी पड़ेगा. जातिगत आरक्षण उनका विशेषाधिकार है. उसमें आर्थिक आरक्षण को जोड़कर हमारे साथ अन्याय किया जा रहा है. जिसका जवाब हम चुनाव में देंगे. हालांकि मध्यप्रदेश के एससी नेता व भाजपा सांसद डॉ. भागीरथ प्रसाद मोदी सरकार के इस फैसले के समर्थन में झंडा बुलंद कर रहे हैं. वहीं राजस्थान में गुर्जर आंदोलन की अगुवाई करने वाले कर्नल बैसला का मानना है कि इसका समय रहते जवाब दिया जाएगा. मध्यप्रदेश के युवा आदिवासियों की आवाज बनकर राजनीति में उतरे जय युवा आदिवसी संगठन के नेता एवं चुनाव जीत कर विधायक बने डा. हीरालाल अलावा का कहना है कि हम इस आरक्षण के खिलाफ हैं.

सामान्य वर्ग को दस फीसदी आरक्षण देकर मोदी सरकार ने आदिवासी समाज के खिलाफ फैसला लिया है. इस देश के संविधान ने आदिवासी, दलितों व पिछड़ों को यह अधिकार दिया था. इसके पीछे वजह थी इस समाज का उत्थान हो और वे समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें. आज भी हालत ऐसे हैं कि ये आदिवासी समाज दबा हुआ और कुचला हुआ है. उसे ताकत देने की जरूरत है. लेकिन सरकार ने सामान्य वर्ग को आरक्षण की सुविधा देकर हमारे अधिकारों को कम किया है. हम इसके खिलाफ मैदान पकड़ रहे हैं. 5 फरवरी को युवाओं का सम्मेलन रखा गया है जिसमें इस मुद्दे को खास तौर पर लिया गया है.
मध्यप्रदेश के मुरैना में एट्रोसिटी एक्ट पर हुए आरक्षित वर्ग के आंदोलन की अगुवाई करने वाले एससी नेता एवं आरक्षण बचाओ समिति के संयोजक जितेंद्र बौध्द का कहना है कि जिस तरह से सरकार ने आरक्षण का दांव खेला है उससे साबित होता है कि वह अपने कोर वोटबैंक की तरफ झुक गई है. हमारी तो साफ मांग है कि सरकार सामान्य वर्ग को 10 नहीं पूरे 15 फीसदी आरक्षण दें लेकिन उनका पचास फीसदी कोटे पर जो अधिकार है वह खत्म कर दे. हम तो कहते हैं कि जनगणना के अनुसार जिस जाति का जितना प्रतिनिधित्व है उसे उस हिसाब से आरक्षण दे दो . सवर्ण समाज का हिस्सा 15 फीसदी है. अन्य 85 फीसदी पर एससी, एसटी ओबीसी, अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित कर दो. यह चुनावी मुद्दा है जिसका जवाब भी चुनाव में दिया जाएगा. राजस्थान में गुर्जर आंदोलन को लेकर लंबी लड़ाई लड़ने वाले फायरब्रांड नेता कर्नल बैसला का कहना है कि 10 फीसदी सामान्य वर्ग का आरक्षण इस तरह लागू नहीं हो सकता. देश में 1952 के हालात नहीं हैं. दरअसल इसे लागू करने से पहले विस्तृत पुर्नविचार और समीक्षा की जरूरत है. ताकि निष्पक्षता से ऐसे लोगों को इस आरक्षण श्रेणी से बाहर निकाला जा सके जो इसके लिए अयोग्य हैं या ऐसे लोगों को शामिल किया जा सके जो इसके पात्र हैं. अगर ऐसा नहीं होता है और यह बिना किसी समीक्षा के लागू होता है तो जनता इसका जवाब देगी और हम जनता के साथ होंगे.
भिंड से भाजपा सांसद एवं एससी संगठन के राष्ट्रीय नेता डा. भागीरथ प्रसाद का कहना है कि मोदी सरकार ने यह ऐतिहासिक फैसला लिया है. हमारी पहले से ही मांग थी कि सामान्य वर्ग को भी आरक्षण का लाभ मिले जो आर्थिक तौर पर पिछड़े हुए हैं. आर्थिक स्तर पर कमजोरों के लिए दिए जाने वाला यह आरक्षण सुप्रीम कोर्ट में मान्य होगा. आरक्षित वर्ग के 49.5 फीसदी कोटे को इसमें यथावत रखा गया है. संविधान संशोधन के बाद 10 फीसदी आरक्षण सामान्य वर्ग के कोटे से ही दिया जाएगा, जिसका बहुत बड़ा असर आने वाले समय में दिखाई देगा.

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