सपा-बसपा गठबंधन का ऐलान, 38-38 सीटों पर लडेंगी दोनों पार्टी, ओर दलों के लिए छोडी इतनी सीटें

लखनऊ। लखनऊ में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव व बसपा सुप्रीमो मायावती की हो रही संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में मायावती ने कहा कि ये ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दोनों गुरू-चेले की नींद उड़ाने वाली है। मायावती ने ऐलान किया कि सपा और बसपा दोनों पार्टियां 38-38 लोकसभा सीटों पर चुनाव लडेंगी। दो सीटें रायबरेली व अमेठी कांग्रेस के लिए छोड़ने का फैसला किया गया है। शेष सीटें रालोद व गठबंधन में शामिल होने वाले अन्य दलों को दी जा सकती हैं।
खास बात यह है कि सपा-बसपा के गठबंधन के एलान के लिए साझा प्रेस कांफ्रेंस उसी जगह होने जा रही है जहां 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी व अखिलेश यादव ने साझा प्रेस कांफ्रेंस करके गठबंधन की घोषणा की थी। राष्ट्रीय लोकदल के किसी नेता के कल की प्रेस कांफ्रेंस में शामिल होने के बारे में अभी कोई सूचना नहीं है। पर, चौधरी अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत के रुख से रालोद का भी इस गठबंधन में रहना तय माना जा रहा है। पहले गठबंधन की औपचारिक घोषणा 15 जनवरी को बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव के जन्मदिन के मौके पर होनी थी। पर, उसी दिन कुंभ का पहला और महत्वपूर्ण स्नान है शायद इसीलिए गठबंधन की औपचारिक घोषणा की तारीख बदली गई।
इसके पीछे मंशा यह भी है कि गठबंधन की घोषणा को मीडिया में पूरा महत्व और स्थान मिले तथा इसकी चर्चा भी हो सके। उम्मीद है कि कल की घोषणा में यह भी साफ हो जाएगा कि कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा और रालोद को इस गठबंधन में कितनी सीटों की हिस्सेदारी मिलेगी। रालोद का भी इस गठबंधन में शामिल रहना लगभग तय है। रालोद प्रमुख चौधरी अजित सिंह ने शुक्रवार को यह तो स्वीकार किया कि गठबंधन तय है लेकिन सीटों के बंटवारे पर अभी निर्णय नहीं हुआ है। उन्होंने कांग्रेस के इस गठबंधन में शामिल होने या न होने पर भी कहा कि सपा और बसपा बड़े दल है। वही इस बारे में तय करेंगे। याद रहे कि मंगलवार को अजित सिंह के पुत्र और रालोद उपाध्यक्ष जयंत लखनऊ में सपा मुखिया अखिलेश यादव से मिले थे। उन्होंने भी कहा था कि गठबंधन तय है लेकिन सीटों पर अभी कोई बात नहीं हुई है। हालांकि सूत्रों ने बताया था कि रालोद ने छह सीटें मांगी है पर उसे तीन-चार सीटें मिल सकती हैं।
लगभग पच्चीस वर्षों बाद सपा और बसपा मिलकर चुनाव लड़ेंगे। जहां तक लोकसभा चुनाव का सवाल है तो पहली बार दोनों पार्टियां परस्पर गठबंधन करके मैदान में उतरने जा रही हैं। इससे पहले 1993 में दोनों पार्टियों ने विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन किया था। उस समय यह गठबंधन बसपा के तत्कालीन सर्वेसर्वा कांशीराम और सपा के उस समय मुखिया मुलायम सिंह यादव के बीच बातचीत के बाद हुआ था। हालांकि मायावती भी उस समय सक्रिय राजनीति में आ चुकी थीं और कांशीराम के बाद बसपा में महत्वपूर्ण भूमिका में थीं। संयोग यह है कि तब भी भाजपा को रोकने के लिए दोनों दल एक साथ आए थे और इस बार भी गेस्ट हाउस कांड की दुश्मनी भुलाकर भाजपा को रोकने के लिए ही दोनों दल एक साथ आ रहे हैं।

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